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मोहन श्रीवास्तव के मुकदमो की हो सकती है दुबारा सुनवाई ,सजा होने के हैं पूरे आसार

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 मोहन श्रीवस्तव को हो सकती है जेल। गया नगर निगम के उप मेयर है मोहन। वैसे तो राजनीति मे अब अच्छे लोगो का मिलना मुश्किल हो गया है लेकिन कुछ लोग तो इस स्तर के है जिनके बारे मे सोचकर के भी आश्चर्य होता है कि कैसे ये जीत  कर  आते हैं ? कौन है  जो इन्हे वोट देता है ? इसी तरह के एक आदमी के बारे मे बता रहा हूं। वह ्है गया नगर निगम का उप मेयर मोहन श्रीवास्तव । इस आदमी ने निगम के गठन के बाद से आजतक कभी भी निगम को सुचारु रुप से नही चलने दिया। इसके चरित्र और क्रियाकलाप को समझने के लिये इसके जिवन के बारे मे जानना जरुरि है। एक सामान्य घर का कामचलाउ सिक्षा प्राप्त इस व्यक्ति ने अपने राजनीतिक  जीवन की शुरुआत स्व० राजेश कुमार एम पी के यहां नौकर बनकर  की । बात बनाने मे माहिर मोहन धिरे धिरे राजेश कुमार का पीए बन गया । वेतन तो मिलता नही था , एम पी के लेटर पैड का इस्तेमाल रेलवे का टिकट बनवाने, किसी की पैरवी करने मे इसने शुरु किया। फ़र्जी काम का यह माहिर था। हस्ताक्षर भी फ़र्जी बनाता था। लेकिन राजेश कुमार तेज एम प...

आत्मकथा भाग 1 ::खोया ही खोया पाया कुछ भी नहीं

खोया ही खोया पाया कुछ भी नहीं अपनी जिवनी लिखना शायद उतना आसान नहीं जैसा सोचा था. आज जब लिखने के पहले यादो के गलियों से गुजरते हुए वहां पहुचा जहां से झरोखे से कुछ धुंधले दृश्य दिख रहे थे तो खुद को रोने से नहीं रोका पाया . कमरा बंद कर के फुटफुट कर बच्चे की तरफ रोया. बड़की माई, नुनु जी, नेता जी, टूनाइ भैया , बाबूजी, सुभाष , चंदु, अरविंद ,श्याम बिहारी चाचा, माई, ये किरदार याद दिला रहे है गाँव की जहाँ से यादे झांक रही है. सात आठ साल की उम्र रही होगी. स्कुल का प्राथमिक विद्यालय लकड़ी की स्लेट जिसे दावात से गालिस करके चमकाता था , खल्ली से उसपे पाठ लिखता था. दस बजे तक खाना बन जाता था . बड़ा सा घर दसियों लोग एक बड़की माई सबका खाना बिना ऊबे लकड़ी, राहर की झाड या गोइठा पर बनाती थी धुंआ को मुह से फुक कर हटाती थी . स्कुल में खेती की शिक्षा भी दी जाती थी उसके लिए एक एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा टीम बनाकर छात्रो को दिया जाता था जिसकी फसल अच्छी हो उसको ज्यादा नंबर मिलता था. सुबह में भात दाल खाकर जाते थे . गरमी में भात खराब ना हो इसलिए पानी में डालकर रखा जाता था. इस पानी वाले भात को सरसों का तेल नमक लाल मिर...

बस बहुत हुआ ,आओ अब लौट चले

बस बहुत हो गया, आओ अब लौट चलें हमें लौटना होगा। जमीन हमारी मां है। इसका उपयोग सदियों से अनाज उगाने के लिये हम करते आये हैं। उसी अनाज को दुबारा बीज के रूप में उपयोग करते हैं। बस हमें आज भी यही करने दिया जाय। मत लो हमारी जमीन। नहीं चाहिये यह विकास जहां हम मुर्दे बनकर रह गये हैं। जहां लाख रुपया हो तभी आपका बेटा पढ़ सकता है। दस लाख हो तो कोचिंग ले सकता है, आईआईटी की, आईएएस की। बस बहुत हुआ लौटा दो 1990 के पहले का देश। गरीब मर रहा है, आम आदमी चोर बन रहा है, भ्रष्ट बन रहा है, बेटे की शिक्षा के लिये, मकान के लिये, बेटी के दहेज के लिये, बस बहुत हुआ। बच्चों का बचपन खो गया, सुबह चार बजे उठते हैं, स्कूल जाना है, होम वर्क है, आखिर यह सब किस लिये? पढ़कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का नौकर बनने के लिये? अब नहीं सहा जाता। पढ़कर आता है बेटा, नौकरी की तलाश, अगर अमीर का बेटा है तो बडे़ कालेज से निकलेगा, इसलिये नहीं की बहुत तेज बुद्धि है। शिक्षा का व्यवसायीकरण हो गया है। स्कूल या कालेज की पढ़ाई सिर्फ़ दिखाने भर को है। कोचिंग चाहिये, उसके लिये पैसा चाहिये। इंजीनियरिंग की कोचिंग करवानी है तो चल जाओ कोटा, डेढ-दो ...

भूमिहार :पहचान की तलाश में भटकती एक नस्ल

हिन्दुस्तान की हर जाती का कही न कही जिक्र प्राचीन धार्मिक - इतिहासिक पुस्तको में मिल जाएगा परन्तु भूमिहार जाति का कही कोई जिक्र प्राचीन ग्रंथो में नहीं मिलेगा । इनकी उत्पति के विषय में विभिन्न मिथ लिजेंड मिलेगा परन्तु प्रमाणिक शोध  पुस्तको में इनका जिक्र  कही शुद्र , कहीं मंगोल मुजफ्फरपुर बिहार  के हुसैनी ब्राहमण , कहीं राजपूत पिता और ब्राहमण माता की सन्तान , कहीं बुद्धिस्ट ब्राह्मण से हिन्दू धर्म में वापस आई जाति के रूप में मिलता है । चुकि प्रमाणिक शोध पुस्तके इन्हें ब्राहमण नहीं मानती और मिश्रित जाती यानी hybrid मानती है जिसके कारण जातीय व्यवस्था वाले भारत में ये खुद को असहज महसूस करते है और कुछ हद तक हीन  भी इसलिए शोध पुस्तको को ये स्वीकार नहीं करते है । खुद को ब्राहमण साबित करने के लिए ये स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा 1916 में  लिखित पुस्तक " भूमिहार ब्राह्मण एक परिचय  " को प्रस्तुत करते हैं  । इस पुस्तक में हिन्दुओ के अनेको धार्मिक ग्रंथो का हवाला देते हुए ब्राहमणों को दो वर्ग में सहजानंद ने विभाजित किया था " याचक " एंव अयाचक "" यानी एक भिक्षाटन...

अभिव्यक्ति की आजादी और गालियाँ

"Miss a meal if you have to, but don't miss a book." --Jim Rohn अभिव्यक्ति की आजादी का बहुत सरल अर्थ है । " आप जो कहना चाहते है उसे कहने की आजादी " freedom to express what you wish " दिक्कत यह है कि इस छोटे से शब्द का दायरा बहुत बड़ा है जिसके कारण अक्सर गलतफहमियां पैदा हो जाती है जिनका परिणाम कभी कभी बहुत ही भयानक होता है । हमने देखा मोहम्मद के कार्टून के लिए charlie hebdo शार्ली एब्दो । इतेफाक से जब वह  घटना हो रही थी मै  एक विदेशी ब्लॉग पर था । तत्क्षण न्यूज फ्लैश हुआ । पहले से विवाद था। हमले हुए थे । मुकदमा चला था। शायद दुनिया का पहला व्यक्ति था मै जिसने तुरंत कार्टून को अपने फेसबुक वाल पर लोड किया , घटना के खिलाफ पोस्ट लिखा।   इस्लामिक संगठनो के संयुक्त राष्ट्र संघ वाला ग्रुप organisation of islamic countries. पूर्व से ही ईशनिंदा को अंतराष्ट्रीय स्तर पर लागू करवाने की योजना बनाता रहा और प्रस्ताव भी संयुक्त राष्ट्र संघ में ला चुका था जो पारित नहीं हुआ ।  यह इस्लामिक राष्ट्रों के संगठन के 57 सदस्य है इसलिए संयुक्त राष्ट्र संघ में इन्हें ignore करना संभव न...