Posts

Showing posts with the label ansan

केजरीवाल तो साला तेज निकला

केजरीवाल तो साला तेज निकला अभी एक नया विवाद खडा हो गया है , वह है अन्ना चौकडी के    सी आइ ए की कवर एजेंसी फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन के इशारे पर काम करनेवाले शातिर अरविंद केजरीवाल का बयान ।मुंबई के फ़्लाप शो के बाद  केजरीवाल को कुत्ता भी अपने योग्य नही मान रहा था । यूपी के चुनाव में कांग्रेस को सबक सिखाने का मंसूबा पाले इस एजेंट को राहुल गांधी के ड्रामे ने चारो खाने चित कर दिया था । कोई घास भी नही डाल रहा था । इसने अपने चमचो के द्वारा कुछ भीड इकठ्ठी करवाई और एक साजिश के तहत भाषण दे मारा कि संसद में चोर लुटेरे बैठे हैं । सारे राजनीतिक दल हो हल्ला मचाने लगें । इसके बयान को हमने भी टीवी पर देखा था और देखकर मुस्कुरा रहा था । इसके भाषण से टपक रही हताशा का मजा ले रहा था मैं,  और समझ गया था कि इस तरह के भाषण का मतलब खबरो मे आना है । मैने अपनी पत्नी से मजाक करते हुये यह भी कहा था , साला अब यह अपनी बीबी से भी पिटायेगा , इसने अपनी के सामने डिंग मारी होगी कि मैं प्रधानमंत्री बनुंगा , अब यह एक मुखिया बनने लायक भी नही रह गया , बेचारा । मुझे क्या मालूम कि हमारे दे...

रामदेव के गुंडो पर मुकदमा क्यों नही

Image
रामदेव के गुंडो पर मुकदमा क्यों नही एक नौजवान कामरान सिद्दिकी ने रामदेव के मुह पर कालिख फ़ेकी । उस नौजवान को रामदेव के गुंडों ने भर दम पिटा । प्रशासन देखता रहा । अखबार वाले जाहिल पत्रकार उस घटना के बाद रामदेव से यह प्रश्न कर रहे थें कि किसका षडयंत्र है । यह आम जनता का गुस्सा है जिसका कारण जनता के साथ रामदेव द्वारा की गई धोखाधडी । रामदेव अरबपति हैं। चोर की तरह औरतों के कपडे पहनकर   भाग   गये थें रामलीला मैदान से । चाहे रामदेव हो या अन्ना , इनकी ताकत नानसेंस वैल्यू है यानी अगंभीर बातों के आधार पर जनता को उद्वेलित करना और मजमा लगाना । आत्मबल नही होता इनके अंदर अन्यथा तुरंत धरना अनशन छोडकर भाग खडे नही होतें । रामलील मैदान में जो हुआ वह एक डरपोक , कायर व्यक्ति हीं कर सकता है , भगत सिंह , या गांधी जैसा व्यक्तित्व तो हरगिज नही , वहीं अन्ना का ड्रामा भी मजेदार रहा , बेचारे पहले से हीं कुछ नही खा रहे थें ( जैसा की उनके अनशन के  समापन के बाद बताया गया ) , लेकिन भीड न देखकर बिमार पड गयें। आनन फ़ानन में अपना तंबू शमियाना उखाडा और चल दिए , साथ में चौकडी भी गायब हो गई , व...

Anna ka Dharna

Image
Anna ka Dharna  यह ब्लाग ओशो ने लिखा है । वह मेरा बेटा है । लिखकर के उसने मेरे ईमेल पर भेजा । मैं उसे यहां दे रहा हूं । लिखना पढना और खासकर समाज के ज्वलंत मुद्दो पर राय व्यक्त करना यह दर्शाता है कि आप समाज के लिये सोचते हैं और शायद यह सोच आपको समाज के लिये कुछ करने को भी बाध्य करती है । Anna Hazare, a well known public figure since the time his Lokpal stint gave him the INDIAN MEDIA’S   MOST ACCLAIMED “BHOOK HARTALI” AWARD is well known by all of us. So this just a reality check at how real is Anna Hzare’s claim to fame using lokpal bill as an alibi. People who’ve different opinion may keep it to themselves because im just using my right to speech. However you may as well appreciate my words and bring me a tad bit closer to Mr. Hazare. So , where were we? Yes, Anna Hazare. So the thing is when this country was leading a perfectly normal life and people had their own problems to cope up with, then came our Super-m-anna. He caused havoc in the political world and had the...

बुढापे में पैदा हुआ अन्ना को बेटा

बुढापे में पैदा हुआ अन्ना को बेटा आश्चर्य न करें राजनीति कुछ भी करा सकती है । जब से अन्ना पर आर एस एस से संबंध  रखने और उसके इशारे पर काम करने का आरोप लगा है , अन्ना  टीम परेशान थी , परेशानी यह थी कि अल्पसंख्यको का वोट ुनके द्वारा गठित या समर्थित भाजपा की सेक्यूलर मुखौटा वाले दल को कैसे मिलेगा । बिहार में नीतीश , एक महान सेक्यूलर हैं , लेकिन सैद्धांतिक रुप से संप्रदायिक सिद्धांतवाले दल भाजपा से खुब छनती है । राष्ट्रीय स्तर पर भी यही ड्रामा करना पडेगा , यह भाजपा को पता है । अन्ना को भी पता है , कांग्रेस और धर्मनिरपेक्ष दलों को तभी पराजित किया जा सकता है , जब उनके अंदर विरोध पैदा किया जाय । जैसा बिहार में किया गया । खैर अब अना टीम की परेशानी खत्म हो गई , अन्ना को बेटा पैदा हुआ है , वह भी  जवान सारी  सारी बुढा । बेटा भी धर्मनिरपेक्ष है , मुस्लिम जो है ।  उस बेटे का नाम है आलाउद्दीन शेख । अब आप यह न प्रश्न करें कि कौन है यह अलाउद्दीन शेख , जायज औलाद है या नाजायज । भाई ७४ वर्ष में बच्चा पैदा हुआ यह क्या कम है जो आपलोग फ़ाल...

तोपपाल ने बनाया सबको उल्लू

तोपपाल ने बनाया सबको उल्लू किसी भी चीज को बिना परखे उसके लिये चाह नही पैदा करनी चाहिये । दो खुराफ़ाती थें , उन्हें नाम कमाने की बडी इच्छा थी । चाहते ्थें कुछ ऐसा करें कि नाम और दाम दोनो आये और महान भी कहलायें। एक था पत्रकार और एक आइएएस बनने में फ़ेल हो गया आइआरएस । लगे रहें खोजबीन में । अचानक उन्होनें देखा पूरी दुनिया में उथल पुथल मची हुई है । अनेको देश में क्रांति क्रांति का नारा लग रहा है , बस उछल पडे दोनो । उन्हें राह मिल गई थी । उन्होने अपने मित्र , सलाहकार , व्यवसायिक मित्रों से सलाह मशवरा शुरु किया । खोजकर के एक नाम निकाला लोकपाल । बडा धांसू नाम था । लोगो को लूभा   सकता था । क्रांति के लिये विषय चुनने में कोई मेहनत नही करनी पडी । देश के लोगों का गुस्सा भ्रष्टाचार के खिलाफ़ था । उसको हीं मुद्दा बनाने का फ़ैसला लिया । माल के लिये एक व्यवसायिक मित्र ने विदेश से दान दिला दिया । सज गया मंच । अब कुछ महा गदहों को खोजने की जरुरत थी , जो अक्ल के अंधे हो लेकिन नाम नयन सुख हो । वह भी मिल गयें , हमारे देश में नयनसुखों की कमी तो है नही। नाम दारोगा काम चोरी , नाम रामजी काम चिरहर...

अन्ना का संडास भी लाइव दिखाइए न

Image
अन्ना का संडास भी लाइव दिखाइए न पणिनि आनंद जनसरोकार वाली पत्रकारिता करते हैं ,बीबीसी में प्रोड्यूसर हैं ।  यह लेख उनके वेबसाईट प्रतिरोध से साभार लिया हुआ है । गुरुवार को जैसे-तैसे सदन में लोकपाल के मुद्दे पर मसौदे के पेश किए जाने के बाद बहस शुरू हुई. चर्चा के दौरान सारे सास-बहु एपिसोड्स को काट रहे चैनलों ने आस्था और निष्ठापूर्वक लोकसभा टीवी का सीधा प्रसारण प्रारंभ कर दिया. उनका योगदान केवल टिकर का था कि किस पार्टी के किस सांसद की क्या टिप्पणी थी. कई लोगों को लगा कि देखो , मीडिया कितना ज़िम्मेदार है. कितनी तत्परता से संसद की कार्यवाही को प्रसारित कर रहा है ताकि पूरा देश देखे कि सदन में लोकपाल को लेकर क्या चल रहा है. इस चर्चा के ठीक बाद सांसदों द्वारा अन्य मुद्दों और सवालों पर वक्तव्य आने थे. लोकपाल की चर्चा खत्म हुई तो स्पीकर ने वामपंथी नेता वासुदेव आचार्य का नाम पुकारा. वासुदेव आचार्य अपनी सीट से खड़े हुए और उनके मुंह से पहला शब्द निकलने तक कुछ सांसद अपनी सीटों से उठकर जाने लगे. दरअसल , वासुदेव आचार्य किसानों की आत्महत्या के मुद्दे पर अपना वक्तव्य दे रहे थे....

अन्ना के कैंप में फ़ैली निराशा ; अथक प्रयास के बाद भी नही जुटी भीड

Image
अन्ना के कैंप में फ़ैली निराशा ; अथक प्रयास के बाद भी नही जुटी भीड अन्ना चौकडी का मीडिया मैनेजमेंट पिछली बार दमदार था । मीडिया को कैसे मैनेज किया जाता जाता है , इसकी जानकारी रखनेवालों को पता है , भारत का मीडिया नियंत्रित होता है विदेश से । अमूमन इस तरह के आंदोलन का प्रबंध पर्दे के पिछे रहकर कार्य करनेवाली ताकते करती हैं। पिछली बार अगस्त में कुछ ज्यादा उत्साहित होकर विदेशी ताकते जिनमें मुख्य सीआईए है ने मीडिया को मैनेज किया था और अच्छी भीड अन्ना के आंदोलन में लगी थी । भीड का स्वभाव चुंबक की तरह होता है । भीड को देखकर भीड जुटती है । सीआईए और उसके कार्यों को कवर देनेवाली संस्था फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन के बारे में सबको पता चल जाने के बाद इसबार उन्होनें खुद को अन्ना के आंदोलन से दुर रहकर आंकलन   करने का निश्चय किया । आर एस एस ने भी पिछली बार आंदोलन को समर्थन दिया था और पूरे देश में उसके कार्यकर्ता आंदोलन के पक्ष में सडकों पर उतरे ...