जेल की पाठशाला मे यशवंत
जेल की पाठशाला मे यशवंत कुमार सौवीर किताबें और तस्वीरेंजिस तरह किसी भी जिज्ञासु में लगातार जानकारियों की इमारत को तैयार करती हैं , ठीकवैसे ही जेल की दीवारों-सलाखों की भूमिका आत्मविश्लेषण के लिए अनिवार्य होती है।और फिर यशवंत सिंह तो जन्मजात जिज्ञासु है। 36 साल के यशवंत के बालमन नेगाजियाबाद की डासना जेल में खुद के लिए एक बेमिसाल और रोचक विद्यालय खोज लिया है। वहवहां पर खोज रहा है वहां बंद लोगों को , लोगों के व्यवहारों को , उनकी दिनचर्या को , उनके मकसद को , उनके लक्ष्य को। वह समझ रहा है कि आखिर वहां की ऊंची प्राचीरों मेंकैद लोगों को यहां क्यों और कैसे मुकाम किस तरह मिले और कैसे अब वे क्या करेंगे।छूटेंगे भी तो आखिर कैसे। छूटने के बाद क्या करेंगे। यशवंत सिंह से भेंट हो ही गयी। लखनऊ के एक बड़े पत्रकार ने दोरंतो ट्रेन का टिकट कटवाया। स्नेही इसपत्रकार ने ही रेलवे हेडक्वार्टर से कोटा रिलीज करवाकर सीट पक्की करायी। सुबह नईदिल्ली स्टेशन पर पहुंचा। गर्मी और उमस के शहर में फिर मेट्रो और ऑटो की सवारीऔर तैयार होने के बाद सीधे गाजियाबाद में अपने एक मित्र के घर अर्ल...